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ऐसे कैसे कारगिल शहीदों को सच्ची श्रद्धांजली!!बे-आसरा वृद्ध माता-पिता और सरकारी उपेक्षा से अपमान-टीस!पुनर्विवाह वाली शहीद पत्नियों को भी इज्जत-योजनाएं:बेरोजगार भाई-बहनों की बदहाली नहीं रखती मायने

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The Corner View

Chetan Gurung

अगले साल लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद देश कारगिल युद्ध विजय की रजत जयंती (25 वर्ष) मना रहा होगा.हो सकता है देश भर में उस वक्त की जो भी केंद्र सरकार होगी, वह पकिस्तान पर इस शानदार फतह को महोत्सव के तौर पर मनाए.खुद को चमकाने के लिए आखिर सरकारें कोई भी हों, मौका कब चूकती हैं? आज कारगिल विजय दिवस पर इस जंग में 75 रणबांकुरों की कुर्बानी देने वाले उत्तराखंड समेत पूरे देश ने शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की.उनकी शहादत को याद किया.तमाम राज्यों ने शहीदों की पत्नियों-आश्रितों और सैनिकों के लिए फिर लुभावनी योजनाओं का ऐलान किया.उनकी मदद-ख्याल रखने का भी वादा किया.देहरादून में भी सरकार ने बहुत बड़ा आयोजन शहीदों को याद करते हुए किया.CM पुष्कर सिंह धामी खुद सैनिक पुत्र हैं.सेना और सैनिकों-पूर्व सैनिकों के प्रति अगाध प्रेम-लगाव और फ़िक्र वह जतलाते रहे हैं.कारगिल युद्ध विजय दिवस पर भी उन्होंने खूब घोषणाएं कीं.इसके लिए उनको बारम्बार बधाई दी जा सकती है.सवाल लेकिन यहाँ खत्म नहीं होते.उठते हैं.

कारगिल शहीदों को विजय दिवस पर श्रद्धांजली अर्पित करते CM पुष्कर सिंह धामी:उनके बगल में सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी हैं

मेरे बड़े भाई मेख गुरुंग कारगिल शहीद हैं.द्रास के मश्कोह घाटी में उन्होंने देश की रक्षा में 22 मई को जीवन कुर्बान किया था.तब घर में किसी को ये भी मालूम नहीं था कि जंग ख़ामोशी के साथ शुरू हो चुकी है.ये मालूम नहीं था कि भाई की शहादत जंग में हो चुकी है.सोशल मीडिया तब था नहीं.अख़बारों-TV-Radio में कोई खबर थी नहीं. शहादत का तार तब पहुंचा जब उनका पवित्र पार्थिव शरीर पवित्र मातृभूमि की मिट्टी में सैकड़ों लोगों की शहीद मेख गुरुंग अमर रहे के गगनभेदी नारों के साथ टपकेश्वर श्मशान घाट में मिल चुका था.देहरादून और उत्तराखंड (तब UP का हिस्सा) में यह पहला पार्थिव शरीर था, जो कारगिल जंग से तिरंगे में लिपट के आया था.फिर उसके बाद मेजर विवेक गुप्ता और अन्य शहीद जांबाज सैनिकों के पार्थिव देह कारगिल-द्रास-बटालिक सेक्टर से राष्ट्र ध्वज में लिपट के ससम्मान फौजी गाड़ियों में आने लगे.

पूरा देश शहीदों के सम्मान में नतमस्तक हो चुका था.आखिर में सैकड़ों की शहादतों और हजारों जवानों के घायल होने के बाद हिन्दुस्तान ने पाकिस्तान के घुसपैठिये फौजियों-आतंकवादियों के पूरे लश्कर को मार गिराया और अपनी धरती से बुरी तरह खदेड़ डाला.हजारों दुश्मनों को हमारे वीर सैनिकों ने मौत की नींद सुला दिया था.उस वक्त की वाजपयी वाली केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने शहीदों के सम्मान में घोषणाओं की कतार लगा डाली.शहीदों की पत्नियों को लाखों रूपये-जमीनें-काबिलियत के हिसाब से आकर्षक सरकारी नौकरियाँ-सरकारी फ़्लैट बारी से पहले-पेट्रोल पम्प-गैस एजेंसियां दी गईं.तनख्वाह भी जारी रखी गई.फिर पेंशन भी दी गई.बड़ी निजी कम्पनियों ने भी नकद मदद की.बड़े-बड़े नामी-गिरामी स्कूलों ने शहीदों के बच्चों को मुफ्त पढ़ाया.डॉक्टरों ने मुफ्त ईलाज का ऐलान किया.मदद करने के लिए सरकारों-बड़ी कम्पनियों और लोगों का सैलाब सा उमड़ पड़ा था.देश उस वक्त देश भक्ति के जूनून में डूबा हुआ था.शहीदों के लिए ऐसी भावनाएं और सम्मान पहली बार उमड़ता दिखा था.

जिन शहीदों की शादी नहीं हुई थी, उनके परिवार में तो सब ठीक रहा.घोर दिक्कत शादीशुदा जांबाज के शहीद होने पर उनके परिवारों में फ़ौरन शुरू हुई.सरकार से पैसों और योजनाओं की बारिश तथा पेट्रोल पम्प-गैस एजेंसियों-जमीन के सरकारी ऐलान ने फ़ौरन ही घर-परिवार तोड़ने शुरू कर दिए.बहुएं तेरहवीं के दिन ही बोरिया बिस्तर ले के शहीद के बे-आसरा हो गए माता-पिता को बेदर्दी संग छोड़ के अपने बच्चों समेत मायके दौड़ गईं.शहीदों के माता-पिता राह देखते रह गए लेकिन बहुओं ने न आना था न ताजिंदगी आईं.उन्होंने पेट्रोल पम्प-गैस एजेंसी-जमीन और लाखों रूपये पाए.PF-जीवन बीमा और बचत के पैसे तो मिले ही.ऐसे भी केस सामने आए जब कुछ शहीदों की बहुएं तेरहवीं का भी इंतजार किए बिना मायके चली गईं.कई माता-पिता के पास शहीद बेटे की तेरहवीं के लिए भी पैसे नहीं थे.लोगों के आगे हाथ फैलाना पड़ा.कई शहीदों के माता-पिता दुखी ह्रदय-कष्ट मय जीवन गुजारते हुए गम के साथ दुनिया को कभी का असमय अलविदा कह चुके हैं.

कई बहुओं ने साल भर बाद ही दूसरी शादी भी कर ली.इसके बावजूद सरकारों-सेना ने उनकी शहीद की पत्नी का दर्जा कायम रखा हुआ है.ये बात हैरान करती है. जांबाज बेटे को खो चुके शहीद के माता-पिता और उनके आश्रित भाई-बहनों की तरफ से तब की केंद्र और राज्य सरकार से ले के आज की मोदी और पुष्कर सरकार तक ने आंखें मूंदी हुई हैं.सरकार ने सिर्फ अविवाहित शहीद के माता-पिता और आश्रितों को तवज्जो दी.विडंबना ये है कि कई शहीदों की पत्नियों ने लोभ का खुला प्रदर्शन किया.एक शहीद अफसर की सैन्य अफसर पत्नी का तलाक का केस अदालत में फाइनल हो चुका था.सिर्फ फैसला आना था.वह फिर भी पैसा-जमीन-पेट्रोल पम्प और अन्य सभी सुविधाओं पर हक़ जमाने लगी.शहीद के पिता भी पूर्व सेनाधिकारी थे.उन्होंने अदालत के सामने सारे दस्तावेज तलाक से जुड़े पेश किए.

दोनों के मध्य के वे पत्र भी अदालत को सौंपे गए, जो साबित करते थे कि तलाक तकरीबन हो चुका था.शहीद से जुड़े लाभ फिर भी दोनों में बंटे.बाकी शहीदों के माता-पिता और आश्रित भाई-बहन ऐसा करने के लिए न सक्षम थे न उन्होंने ऐसा करना उचित समझा.वे ऐसा कर के तमाशा खड़ा कर शहीद की आत्मा को दुखी नहीं करना चाहते थे.मैंने तब देहरादून के हर शहीद के अंतिम संस्कार को बतौर रिपोर्टर अन्दर तक जा के कवर किया था.उनके घर-परिवार के हाल और खस्ता आर्थिक दशा पर स्टोरी की थीं.हकीकत ये है कि सरकारों ने बंद आँखों और कानों के साथ ठस दिमाग से शहीदों के परिवारों को मदद के नाम पर बहुत खराब और नकारात्मक काम किया था.विडंबना है कि ये सिलसिला केंद्र और राज्य की मौजूदा सरकारों तक कायम है.

शायद सरकारों को लगता है कि सिर्फ पत्नियों और उनके बच्चों के लिए ही योजनाएं और मदद से शहीदों की आत्माएं खुश हो के उनको दुआएं देंगी.शहीद का अर्थ सरकारों के लिए आज भी सिर्फ पत्नी-बच्चे हैं.उसकी निगाह में जन्म देने वाली माँ-पिता और बचपन से शहीद हो गए भाई की कलाई में राखी बाँधने वाली लाडली बहन और छोटे भाइयों का शहीद से कोई वास्ता नहीं रह गया था.प्रेमनगर के करीब एक शहीद की पत्नी ने दूसरी शादी करने के लिए एक साल रुकना भी गवारा नहीं किया था.फौजी पति शादी के 10-12 दिन बाद ही जंग में चला गया था.फिर शहादत हासिल हो गई.इतने दिनों में तो ढंग से पति-पत्नी एक-दूसरे की भावनाओं और परिवार को समझ भी नहीं पाए होंगे.प्यार और गम-पीड़ा उस शहीद की पत्नी के चेहरे से लगा हाथों हाथ काफूर हो चली थी.पुनर्विवाह के बाद उसने शहीद पति के परिवार को भला क्यों देखना था!

विधान परिषद (UP) के सभापति नित्यानंद स्वामी ने तब ऐसे हालात को गंभीरता से महसूस कर शहीदों के माता-पिता और भाई-बहनों की भी मदद करने की दरकार कारगिल युद्ध के दौरान ही जताई थी.सवा साल भर बाद ही उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ.वह अंतरिम बीजेपी सरकार के पूरी ताकत वाले CM बने.ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि उन्होंने भी सत्ता के मुखिया होने के बाद इस दिशा में और खुद की सोच को अमल में लाने के प्रति कुछ नहीं किया.वह डेढ़ साल मुख्यमंत्री रहे थे.ये अच्छा-ख़ासा वक्त था.आज भी शहीदों के माता-पिता ग़ुरबत में जिंदगी गुजार रहे.शहीद हो गए बेटे ही ज्यादातर परिवारों का इकलौता आसरा और कमाऊ था.वही वतन पर कुर्बान हो  गया.बहु ने दुश्मन से बड़ा घाव दिया.सरकार ने घनघोर उपेक्षा कर माता-पिता के गहरे जख्म में नमक-मिर्च छिड़कने का काम किया.आज तक शहीदों के छोटे भाई बेरोजगार और धक्के खा रहे.छोटे-मोटे काम कर अपना और परिवार का जैसे-तैसे पेट भर रहे.

दिखावेबाजी में घिरी और झूठी वाह-वाही लूटने में मशगूल सरकारें शहीदों के सम्मान में शौर्य स्थल-सैन्य धाम-शहीद स्थल और न जाने क्या-क्या बना रही हैं.अरबों रूपये इस पर खर्च हो रहे.कमीशनबाजी हो रही. क्या वाकई सरकारें शहीद और उसके परिवारों के प्रति सम्मान भाव रखती हैं? शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि ये नहीं है कि पहले से ही सरकारी योजनाओं-रूपये-पैसों-जमीनों-पेट्रोल पम्प-गैस एजेंसियों के बोझ से दबा दी गई उनकी पत्नियों को कारगिल विजय दिवस पर सम्मानित और माता-पिता-आश्रित भाई-बहनों की उपेक्षा कर इस दिन खास तौर पर उनको अपमानित किया जाए.उनके दर्द-पीड़ा को हरा किया जाए.क्या सरकार ये भी जानती है कि किस शहीद के कौन-कौन भाई आज तक बेरोजगार हैं?या फिर पेट भरने के लिए गुजारा लायक खस्ताहाल जिंदगी जी रहे!हकीकत ये है कि उनके पास अपने बच्चे पढ़ाने-ढंग का इलाज कराने का भी संकट है!

बेहतर होगा कि सरकारी मशीनरी `देर आए-दुरुस्त आए’ साबित कर कुछ ऐसे कदम उठाएं कि वाकई शहीद की आत्मा संतुष्ट और खुश हो.युवा और समझदार-परिपक्व मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस दिशा में कुछ करते हैं तो वह नजीर कायम करने वाले साबित होंगे.उनकी राह पर हो सकता है कि अन्य राज्य और केंद्र सरकार भी चलें.उनसे उम्मीद की जा सकती है.उनको ये भी देखना होगा कि शहीदों के नाम वाली सड़कों के नाम-पते आज भी सरकारी दस्तावेजों में बदले नहीं गए हैं.शहीद मेख गुरुंग मार्ग की जगह आज भी New Cantt रोड लिखा जता है.दिलाराम चौक पर जो शहीद की नाम पट्टिका है, उस पर पर्चे चिपके रहते हैं.पेंट नहीं किया जाता है.शहीदों का सम्मान इस तरह नहीं किया जाता है.

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